ये मेरी जिंदगी पिघलती क्यूँ नही …

Posted: April 12, 2014 by Ankur in Contest, Hindi Write-ups, Writes...
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Contestये मेरी पत्थर रूपी जिंदगी पिघलती क्यूँ नही 
ये बुझी हुई रख अब राख़ क्यूँ जलती क्यूँ नही, 
न जाने किस जलन के साये मे जल रहा हूँ 
इस जिंदगी का नही पता , पर मैं पिघल रहा हूँ । 

मेरे इस पिघलन मे मेरा सब कुछ है जल जाता 
उन बातों को वो खामोशी से कह जाता ,
काश मेरा अक्स इस पिघलन के साये से बच जाता 
तो मेरा जो मेरा है , मुझ मे ही रह जाता । 

वो मुझ मे ही रह जाता , काश उस दिन ने दस्तक न दी होती 
तो मेरी जिंदगी काटों भरी न होती ,
इन काटों के जख्म अब नासूर बन गए हैं ,
कभी न जाने वाले वो निशान छोड़ गए हैं ,

एहसान तेरा मैं मानु , तन्हा मुझे जो किया है 
कम से कम वो दर्द भरा निशान तो दिया है ,
ये निशान एक एहसास है , जो तेरी याद दिलाता है 
मुझसे तुझसे कभी प्यार था ,इसका सबूत लाता है …

Vishal Maurya

Zakir Husain Delhi College, DU

vishal18995@gmail.com

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