तुझसे एक शिकायत है …

Posted: April 25, 2014 by Ankur in Hindi Write-ups, Writes...
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पहले जो कलियाँ खिलती थी कभी अब वो खिलती क्यूँ नही
अब किसी खुशी से परिचय होता क्यूँ नही ,
रूत भी वही है , फिजा भी वही है 
मैं तो यहाँ हूँ पर मेरा अक्स और कहीं है । 

शायद वो तुझमे था समाया ,
जब मैंने अपने आप को तन्हा था पाया । 
कुछ वीराना सा था वो पल , 
जिसका साया छाया है मुझ पर आजकल । 
उफ़्फ़ तेरे बेदर्द दिल के दरिया का किनारा ,
जो मुझे न दे सका कभी सहारा । 

मेरी कश्ती थी उसमे डूबी ,
फतह-ए-इश्क थी जिसकी खूबी । 
जब तूफान आए ,तो उन किनारो को साहिल समझा हमने ,
जब मेरे हौसले डगमगाने लगे ,तब उन किनारो को दी आवाज़ हमने । 
पर फिर किसी आवाज ने मेरे दिल के दर्द को पनाह न दी , 
ऐसा लगा मैंने खुद की आवाज़ खो दी । 
फिर भी एक आवाज फिजा मे गूंज रही थी , 
फतह -ए-इश्क का पैगाम लिए घूम रही थी । 
जिन किनारो के दिल्लगी पर हमे ऐतबार था ,वो दिल्लगी दगेबाज़ थी
अब जो मैं सुन रहा था 
वो मेरी ही आवाज थी…….वो मेरी ही आवाज थी …

Vishal Maurya

Zakir Husain Delhi College, DU

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