अधूरा ख्वाब

Posted: June 24, 2014 by Ankur in Hindi Write-ups, Writes...
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उस धुंधली रात का वो धुंधला सा ख्वाब 
जो याद है मुझे आज भी ,
एक रहगुज़र थी 
जो जा रही थी वही पुराने किले के पास ,
जहां हम तुम कभी मिले थे 
जहां तुमने अपने गम मेरे सीने मे सीले थे । 

न जाने कैसे थी वो बादलो की साजिश 
जो मैं न समझ पा रहा था ,
पर तेरा अक्स अब भी मुझे नजर आ रहा था । 
तुम नंगे पाँव उन पत्थरों के बीच तेजी उस किले की तरफ जा रही थी , 
तुझे चोट न लग जाए इस डर से मेरी धड़कने चोट खा रही थी। 
शायद तुम मुझे ही ढूंढ रही थी ,
पर मैं तो तुम्हारे पीछे था । 

ज़ोर-2 से आवाज देने लगा मैं उस अक्स को , 
पर उस अक्स ने मेरी आवाज को न जाने क्यूँ अनसुना कर दिया । 
एक खला ( दूरी ) थी जो अपने बीच लगातार बनती जा रही थी,
फिर वो अक्स उस धुंधली रोशनी मे कहीं धुंधला हो गया , 
जब मैं किले तक पहुँचा, तब वो अक्स गायब हो गया । 
जिस अक्स के मैं पीछे था ,वो अक्स दगा दे चुका था 
जो ख्वाब मैं देख रहा था , अब वो अधूरा रहकर टूट चुका था …

Vishal Maurya

Zakir Husain Delhi College, DU

vishal18995@gmail.com

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