Kritika @ KIIT

‘कृतिका’ दिल की कलम से

 

एक ऐसी कलम जिसकी स्याही कभी खत्म नहीं हो सकती । एक ऐसी स्याही जिसके द्वारा लिखी हुई हर एक रचना दिल से होते हुए दिमाग तक पहुँचकर हमारे रोम-रोम को छू जाती है। परमात्मा से लेकर मनुष्य तक हर कोई इस कलम से जुड़ा हुआ है। हमारी भाषाएँ विभिन्न हो सकतीं हैं,लेकिन सबके दिलों को जोड़ने का काम करती है,केवल हमारी कृतिका वार्षिक पत्रिका। तो आइए जुड़ जातें हैं , हम सभी को एक बनाती “अनेकता में एकता” का बोध करवाती हमारी और आपकी वार्षिक पत्रिका से।

कृतिका शब्द का अर्थ अगर हम खोजें तो हमें मालूम चलता है की “कृतिका” का सही मतलब आसमान मे छुपी एक चमकते हुए एक तारे से है। जिसकी चमक कभी खत्म नहीं हो सकती। जो अरबों-खरबों तारों के बीच में भी अपनी एक अलग पहचान बना लेती है। जिसकी चमक रात के अंधेरे में चाँद की रोशनी के साथ और भी बढ़ती चली जाती है।

ठीक उसी प्रकार हमारे कीट विश्वविद्यालय में “कृतिका” केवल वार्षिक पत्रिका ही नही है, “कृतिका” हमारे लिये खुशी का एक रूप है। एक ऐसी खुशी जो पूरे वर्ष हमारे विश्वविद्यालय से जुड़े हुए हर एक इंसान के चेहरे पर देखी जा सकती है। “कृतिका” वार्षिक पत्रिका बस एक माध्यम है,उन खुशियों को एक जगह संजोने का ।

Kritika

हमारे कीट विश्वविद्यालय एवं कलिंगा इन्स्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेस के संस्थापक माननीय डाक्टर अच्युता सामंत  पूरे उड़ीसा ही नहीं ,पूरे विश्व के शिक्षण जगत में अपनी एक अलग पहचान रखते हैं। हमारी “कृतिका”-वार्षिक पत्रिका का यह सौभाग्य रहा है की हमारे संस्थापक और हमारे उत्कृष्ट विद्यार्थियों का ही मेहनत का परिणाम रहा है की,हमारी वार्षिक पत्रिका को पूरे देश में एक अलग स्थान प्राप्त हुआ है।

साथ ही स्टूडेंट अफेयरस की निदेशिका माननीय डाक्टर सुचेता प्रियबादिनी का जिस तरह सहयोग हमारी वार्षिक पत्रिका को मिला है वह काबिल ए तारीफ है। उनकी ही प्रेरणा और मेहनत का फल है की “कृतिका” कामयाबी की इन बुलंदियों तक पहुँच सकी है। साथ ही देश के ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के प्रमुख लेखकों का समय-समय पर हमारी वार्षिक पत्रिका को आशीर्वाद प्राप्त होते हुए आ रहा है।

विश्व विख्यात प्रमुख नामों में से एक पद्मश्री रस्कीन बाँड और रबींदर सिंह जैसे लेखकों ने “कृतिका” के साथ जुड़कर हमें काफी लाभान्वित किया है। इन सभी महानुभावों के सहयोग के बिना “कृतिका” को इतनी ऊँचाईयों तक पहुँचाना नामुमकिन सा लगता है।

“कृतिका”-वार्षिक पत्रिका में केवल कहानियाँ और कविता ही नहीं छापी जाती है,बल्कि विद्यार्थियों के अंदर छुपी हुई हर-एक कला को निखारने का मौका दिया जाता है। चाहे वो पेंटिंग,फोटोग्राफी,निबंध,जोक्स,शायरी ही क्यूँ ना हो। हमारी पत्रिका में “कृतिका…दिल की कलम से” का अर्थ ही यही है की हम उन रचनाओं को छापतें हैं जो सीधे दिल को छू जाए । जहाँ हिन्दी,अँग्रेजी और उड़ीया तीनों भाषाओं की रचनाओं को समान रूप से जगह दी जाती है।

हमारी “कृतिका” वार्षिक पत्रिका को कैंपस राइटिंग के रूप में एक नया मित्र प्राप्त हुआ है।जिसके साथ जुड़कर हम “कृतिका” के सदस्य खुद को काफी गौरवान्वित महसूस कर रहें हैं।आशा करतें हैं की यह साथ यूँ ही अटूट रहे और पूरे देश-विदेश में हमारी “कृतिका” का नाम यूँ ही चमकता रहे।

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