Archive for the ‘Hindi Write-ups’ Category


कभी तो बुलाया होगा …मुझे अपने तसव्वुर मे ,
वरना मेरा दिल… यूं ही किसी के लिए बेकरार नही होता !

कभी तो जागा होगा… एक विश्वास मेरे लिए , तेरे अहसासों की हवाओ मे ,
वरना इन हवाओ पर… यूं ही मुझको ऐतबार नही होता !

कभी तो हराया होगा…तूने मेरे अहम को ,अपने तासीर की सीमाओं मे ,
वरना मेरा अहम …यूं ही शर्मसार नही होता !

कभी तो कुछ नशा घोला होगा… तूने भी , इन बहती फिज़ाओ मे ,
वरना मैं कभी… यूं ही इतना तेरा तलबदार नही होता !

कभी तो ‘बादल’ बन छुआ होगा… मैंने तेरे मन की ‘तह’ को , तेरे सौबत के ‘आँगन’ मे ,
वरना तेरी आंखो से वो ‘भीगा’ आँगन …यूं ही इतना खुशगवार नही होता !

कभी तो जीता होगा… मैंने तेरे दिल को , तेरे नफरत की आंधीयों मे ,
वरना तुझे मुझसे… यूं ही प्यार नही होता !

Vishal Maurya

Zakir Husain Delhi College, DU

inspartec@gmail.com

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देश में पहले भी आपराधिक घटनाऐं होती रही हैं । लेकिन लगभग 10 वर्षों से इसमें बहुत इजाफा हुआ है । बल्कि नारी समाज को जिस तरह से प्रताड़ित किया गया है वो बहुत निंदनीय है । जिस समाज में औरत को देवी का दर्जा प्राप्त है,वहीं पर उसके इज्जत के साथ खिलवाड़ किया जाता है । यह सब देखकर भी हम लोग चुप रह जाते हैं । आखिर इन सब के पीछे कारण क्या है? कारण तो बहुत हैं पर उनमें से एक है,पश्चिमि सभ ्यता के पीछे भागना और गंदी सोच का पनपना ।

हमारी संसक्रिति और सभ्यता कभी भी हमें गलत नहीं सिखाती थी । क्या ये वही भारत वर्ष है,जहाँ नारी को सर्वोपरी माना जाता था ? क्या ये वही देश है,जहाँ नारी का स्थान पहले था ? क्या ये वही देश है,जहाँ सती और सीता का जन्म हुआ था ? बहुत व्यथा के साथ कहना पड़ता है कि, नहीं ये यह वो भारत नहीं रहा ।

बदल चुका है देश । बदलाव कुछ मामलों में अच्छें है,लेकिन अधिकतम मामलों में नकारात्मक ही प्रभाव पड़ा है ।इतिहास गवाह है कि भारत देश सदैव गुरु की भूमिका में रहा है । लेकिन उसके ही बच्चे गलत राह पर जा रहें हैं । हम चमक के पीछे भागना चाहतें हैं,भले उसका अंजाम जो भी हो ।

देश का हाल ऐसा हो गया है कि नारी शक्ति को सलाम करने वाला देश,उसे ही सम्मान नहीं दे पा रहा । आखिर क्यूँ हर रोज देश के किसी ना किसी कोने में उनकी इज्जत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है ? आखिर क्यूँ एक लड़की अकेले घर से बाहर जाने में घबराने लगी है ? सवाल बहुत हैं,जवाब भी हमारे ही अंदर ही छुपा हुआ है । जरुरत है मानसिकता बदलने की,वक्त के साथ नारी जगत के साथ-साथ चलने की ।

भगवान ने भी नारी को “जननी” का दर्जा दिया है,तो हम कौन होते हैं उनके साथ खिलवाड़ करने वाले ?हम कौन होते हैं,उनके साथ अन्याय करने वाले ? पुरुष और नारी एक दूसरे के लिये पूरक हैं । हम सभी को जरुरत है,अपने नजरीये को बदलने की जहाँ कुछ लोग नारीयों के साथ दुर्व्यवहार करते रहते हैं ।

लेकिन वो भूल जाते हैं कि उसी नारी रुप ने उसे जन्म भी दिया है । अगर नारी ना होतीं तो यह पूरा ब्रम्हाण्ड भी ना होता ,ना ही हम पुरुष होते । समाज को बचाना है अगर तो अब भी जाग जाओ और नारी का सम्मान करो । अंततः खत्म करने से पहले एक वाक्य कहना चाहूँगा कि – “नारी का सम्मान जहाँ,समाज का उत्थान वहाँ ।

Indranil Sukla

KIIT University

suklaindranil@gmail.com


एक रोज जो ‘जिंदगी’ ने दी थी गवाही, मेरे ख्वाब के सच होने की
आज जब पहुचा ‘अदालत –ऐ-जिंदगी’ मे तो , बयान से मुकरने लगी ।

सोचा था जो… ये हवाए , परवाज़ देंगी मुझे ‘मंजिल की दिशा’ मे
आज जो उड़ान भरी तो , अपना रुख बदलने लगी ।

गुमान था…. जिस ‘दोस्ती’ पर ,कहते थे यार जिनको
आज जब मुश्किलों से सामना हुआ तो , दोस्ती दगा देने लगी ।

कहती थी… जो ‘रात’ मुझसे ,मेरे ख्वाबों को सहेजेगी
आज जब ख्वाब पूरा होने को हुआ तो , सुबह को बुलाने लगी ।

सँजोये रखा था… जिस ‘दर्द’ को , के लिखेंगे कभी ‘मरहम की स्याही’ मे डुबोकर
आज जब ‘विशाल’ लिखने बैठा तो , स्याही सूखने लगी ……..

Vishal Maurya

Zakir Husain Delhi College, DU

inspartec@gmail.com

अधूरा ख्वाब

Posted: June 24, 2014 by CampusWriting in Hindi Write-ups, Writes...
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उस धुंधली रात का वो धुंधला सा ख्वाब 
जो याद है मुझे आज भी ,
एक रहगुज़र थी 
जो जा रही थी वही पुराने किले के पास ,
जहां हम तुम कभी मिले थे 
जहां तुमने अपने गम मेरे सीने मे सीले थे । 

न जाने कैसे थी वो बादलो की साजिश 
जो मैं न समझ पा रहा था ,
पर तेरा अक्स अब भी मुझे नजर आ रहा था । 
तुम नंगे पाँव उन पत्थरों के बीच तेजी उस किले की तरफ जा रही थी , 
तुझे चोट न लग जाए इस डर से मेरी धड़कने चोट खा रही थी। 
शायद तुम मुझे ही ढूंढ रही थी ,
पर मैं तो तुम्हारे पीछे था । 

ज़ोर-2 से आवाज देने लगा मैं उस अक्स को , 
पर उस अक्स ने मेरी आवाज को न जाने क्यूँ अनसुना कर दिया । 
एक खला ( दूरी ) थी जो अपने बीच लगातार बनती जा रही थी,
फिर वो अक्स उस धुंधली रोशनी मे कहीं धुंधला हो गया , 
जब मैं किले तक पहुँचा, तब वो अक्स गायब हो गया । 
जिस अक्स के मैं पीछे था ,वो अक्स दगा दे चुका था 
जो ख्वाब मैं देख रहा था , अब वो अधूरा रहकर टूट चुका था …

Vishal Maurya

Zakir Husain Delhi College, DU

vishal18995@gmail.com


पहले जो कलियाँ खिलती थी कभी अब वो खिलती क्यूँ नही
अब किसी खुशी से परिचय होता क्यूँ नही ,
रूत भी वही है , फिजा भी वही है 
मैं तो यहाँ हूँ पर मेरा अक्स और कहीं है । 

शायद वो तुझमे था समाया ,
जब मैंने अपने आप को तन्हा था पाया । 
कुछ वीराना सा था वो पल , 
जिसका साया छाया है मुझ पर आजकल । 
उफ़्फ़ तेरे बेदर्द दिल के दरिया का किनारा ,
जो मुझे न दे सका कभी सहारा । 

मेरी कश्ती थी उसमे डूबी ,
फतह-ए-इश्क थी जिसकी खूबी । 
जब तूफान आए ,तो उन किनारो को साहिल समझा हमने ,
जब मेरे हौसले डगमगाने लगे ,तब उन किनारो को दी आवाज़ हमने । 
पर फिर किसी आवाज ने मेरे दिल के दर्द को पनाह न दी , 
ऐसा लगा मैंने खुद की आवाज़ खो दी । 
फिर भी एक आवाज फिजा मे गूंज रही थी , 
फतह -ए-इश्क का पैगाम लिए घूम रही थी । 
जिन किनारो के दिल्लगी पर हमे ऐतबार था ,वो दिल्लगी दगेबाज़ थी
अब जो मैं सुन रहा था 
वो मेरी ही आवाज थी…….वो मेरी ही आवाज थी …

Vishal Maurya

Zakir Husain Delhi College, DU


Contestये मेरी पत्थर रूपी जिंदगी पिघलती क्यूँ नही 
ये बुझी हुई रख अब राख़ क्यूँ जलती क्यूँ नही, 
न जाने किस जलन के साये मे जल रहा हूँ 
इस जिंदगी का नही पता , पर मैं पिघल रहा हूँ । 

मेरे इस पिघलन मे मेरा सब कुछ है जल जाता 
उन बातों को वो खामोशी से कह जाता ,
काश मेरा अक्स इस पिघलन के साये से बच जाता 
तो मेरा जो मेरा है , मुझ मे ही रह जाता । 

वो मुझ मे ही रह जाता , काश उस दिन ने दस्तक न दी होती 
तो मेरी जिंदगी काटों भरी न होती ,
इन काटों के जख्म अब नासूर बन गए हैं ,
कभी न जाने वाले वो निशान छोड़ गए हैं ,

एहसान तेरा मैं मानु , तन्हा मुझे जो किया है 
कम से कम वो दर्द भरा निशान तो दिया है ,
ये निशान एक एहसास है , जो तेरी याद दिलाता है 
मुझसे तुझसे कभी प्यार था ,इसका सबूत लाता है …

Vishal Maurya

Zakir Husain Delhi College, DU

vishal18995@gmail.com


Contestदेश में पहले भी आपराधिक घटनाऐं होती रही हैं । लेकिन लगभग 10 वर्षों से इसमें बहुत इजाफा हुआ है । बल्कि नारी समाज को जिस तरह से प्रताड़ित किया गया है वो बहुत निंदनीय है । जिस समाज में औरत को देवी का दर्जा प्राप्त है,वहीं पर उसके इज्जत के साथ खिलवाड़ किया जाता है । यह सब देखकर भी हम लोग चुप रह जाते हैं । आखिर इन सब के पीछे कारण क्या है? कारण तो बहुत हैं पर उनमें से एक है,पश्चिमि सभ ्यता के पीछे भागना और गंदी सोच का पनपना । हमारी संसक्रिति और सभ्यता कभी भी हमें गलत नहीं सिखाती थी । क्या ये वही भारत वर्ष है,जहाँ नारी को सर्वोपरी माना जाता था ? क्या ये वही देश है,जहाँ नारी का स्थान पहले था ? क्या ये वही देश है,जहाँ सती और सीता का जन्म हुआ था ? बहुत व्यथा के साथ कहना पड़ता है कि, नहीं ये यह वो भारत नहीं रहा । बदल चुका है देश । बदलाव कुछ मामलों में अच्छें है,लेकिन अधिकतम मा मलों में नकारात्मक ही प्रभाव पड़ा है ।इतिहास गवाह है कि भारत देश सदैव गुरु की भूमिका में रहा है । लेकिन उसके ही बच्चे गलत राह पर जा रहें हैं । 

हम चमक के पीछे भागना चाहतें हैं,भले उसका अंजाम जो भी हो । देश का हाल ऐसा हो गया है कि नारी शक्ति को सलाम करने वाला देश,उसे ही सम्मान नहीं दे पा रहा । आखिर क्यूँ हर रोज देश के किसी ना किसी कोने में उनकी इज्जत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है ? आखिर क्यूँ एक लड़की अकेले घर से बाहर जाने में घबराने लगी है ? सवाल बहुत हैं,जवाब भी हमारे ही अंदर ही छुपा हुआ है ।

जरुरत है मानसिकता बदलने की,वक्त के साथ नारी जगत के साथ-साथ चलने की । भगवान ने भी नारी को “जननी” का दर्जा दिया है,तो हम कौन होते हैं उनके साथ खिलवाड़ करने वाले ?हम कौन होते हैं,उनके साथ अन्याय करने वाले ? पुरुष और नारी एक दूसरे के लिये पूरक हैं । हम सभी को जरुरत है,अपने नजरीये को बदलने की जहाँ कुछ लोग नारीयों के साथ दुर्व्यवहार करते रहते हैं ।

लेकिन वो भूल जाते हैं कि उसी नारी रुप ने उसे जन्म भी दिया है । अगर नारी ना होतीं तो यह पूरा ब्रम्हाण्ड भी ना होता ,ना ही हम पुरुष होते । समाज को बचाना है अगर तो अब भी जाग जाओ और नारी का सम्मान करो । अंततः खत्म करने से पहले एक वाक्य कहना चाहूँगा कि – “नारी का सम्मान जहाँ,समाज का उत्थान वहाँ ।

 

Indranil Sukla

KIIT University

Mn ki aawaj

Posted: April 3, 2014 by CampusWriting in Hindi Write-ups, Writes...
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ये दुनिया का झमेला ,
अब और सहा नही जाता है ।.
इस दुनिया से मुकिती पाने का मेरा मन अब करता है। 
इस दुनिया से मुकिती पाने का मेरा मन अब करता है । .
जब य़े बात मेरे मन मे आती है ,एक और बिचार आ जाता हैँ ।
मम्मी पापा के सपनो को पंख दीलाने का मेरा मन अब करता है ,
उनकी उमीदो को एक नयी पहचान दीलाने का मन अब करता हैँ , अब और सहा नही जाता है ।
इस दुनिया से मुकिती पाने का मेरा मन अब करता है । अमित कुमार 
बी.बी.डी.कालेज लखनऊ

Amit Kumar

BBDNITM Lucknow

Mann ye Bawra…

Posted: March 29, 2014 by CampusWriting in Hindi Write-ups, Writes...
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बावरा हुआ रे मन ये बावरा हुआ . . 
अपनी ही धुन में मन मेरा ये बावरा हुआ . . 

मेरे दर की हर दहलीज़ को ये लाँघता चला . . 
कुछ टेढ़े-मेढ़े रस्तों पर . . 
. . . कभी इस डगर कभी उस डगर . . 
. . . . . . या कोई सपनों का शहर , तलाशने चला . . 
बावरा हुआ रे मन ये बावरा हुआ . . 

बाधाओं की लकीर को मिटाता चला . . 
न जाने किस दिशा की ओर . . 
. . . हर बात की फ़िकर को छोड़ . . 
. . . . . . रहा न मेरा इसपे ज़ोर , ये चलता चला . . 
बावरा हुआ रे मन ये बावरा हुआ . . 
अपनी ही धुन में मन मेरा ये बावरा हुआ . . !!

Sugandh Jha

sugandh_passionate@yahoo.com


Here in this poem ,poet wants to say…

every bank of river can not be ur bank that can buy ur desired dreams ….
you have to work hard to get your final destination……!!

Let see how many of you reach …

कल जब हवाओं ने साथ न दिया ,तो मैंने फिजा से पूछा
ऐ जिंदगी बता तेरी रजा क्या है ??
इस तरह जीने मे मजा क्या है ??
तब जिंदगी ने जवाब दिया —
अगर तू सिर्फ जीने की ख्वाईश रखता है ,
अगर तू हर किनारे को अपना साहिल समझता है ,
समझता है ,प्रतिभा की हर आराइश सिर्फ तुझमे है ,
आ चुका है तू ,हर छितिज के पार ,
लक्ष्य भेद सकता है तेरा हर वार,
तो समझ ले एक मृगतृसना का मोहताज है तू ,
एक गूंगी सी आवाज है तू,
जो न समझ पाया ,उसी से अंजान है तू 
निकाल पड़ा है तू ,एक अनजाने से सफर पर 
एक सफर जिसकी कोई मंजिल नही, 
एक कश्ती जिसका कोई साहिल नही ।

फिर मैंने कहा …..
समझा चुका हूँ मैं अब –
हर किनारा साहिल नही होता ,
अभी प्रतिभा की हर आराइश को पाना है
हर छितिज के पार जाना है 
इस सोने को तप कर कुन्दन बन जाना है 
वैसे भी हर वार कों कहाँ लक्ष्य भेद पाना है ??
वैसे भी हर वार कों कहाँ लक्ष्य भेद पाना है ??

Vishal Maurya

Zakir Husain Delhi College , DU

vishal18995@gmail.com