Archive for the ‘Hindi Write-ups’ Category

जीने की वजह

Posted: March 6, 2014 by Ankur in Hindi Write-ups, Writes...
Tags: ,

…न जाने क्यूँ ये जिंदगी उन चंद ख्वाहिशों की मोहताज है ,
न जाने क्यूँ इन खामोशीयों मे भी आवाज़ है। 
मेरी रूह अब करती एक आवाज़ है ,
हाँ एक रूह की आवाज़ है ,
जो दे रही एक अज़ाब (पीड़ा) है 
एक अज़ाब जो बुन रहा एक ख्वाब,
उस ख्वाब का पंछी हूँ मैं ,
जो हो रहा है उसका साक्षी हूँ मैं ,
ये वही हूँ मैं,
जो उस दर्द का गुनहगार है 
हर उस खुशी का हकदार है ,
जो अब तक उससे जुदा है
जुदा है तब तक ,
जब तक ये ख्वाब पूरा न हो 
जब तक इस पंछी की उड़ान पूरी न हो ।

माना ये दर्द मुझे जीने न देगा 
पर मुझे पूरा विश्वाश है ,
यही मुझे जीने की वजह देगा 
यही मुझे जीने की वजह देगा …

Vishal Maurya

Zakir Husain Delhi College, DU

vishal18995@gmail.com

Advertisements

मैं

Posted: February 25, 2014 by Ankur in Hindi Write-ups, Writes...
Tags: ,

मैं आज भी घर से माँ के पांव छूकर निकलता हु…
मैं आज भी माँ की बनाई सब्जी पड़ोसी के घर छोर जाता हूँ…..

मैं आज भी घर से निकलते वक़्त
चाभियाँ पड़ोसी के घर छोर जाता हूँ….
मैं आज भी रास्ते में चलते वक़्त किसी को
साइकिल पर छोर देता हूँ……
किसी को जरुरत पड़ी अगर तो
उसकी मदद भी कर देते हैं…….

ऐसा कहकर मै अपनी बड़ाई नहीं कर रहा हूँ
मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि
मैं शहर में नहीं
बल्कि भारत के एक गाँव में रहता हूँ……!!

Rajat Ranjan

NIFT Bhubaneswar


उनके नूर की तासीर जहां से हो के गुजरी है,
हमारे आंखो की नजाकत वही पर खो के गुजरी है ,
मगरूरियत के छितिज पर ,
आलिंगन के चौखट पर ,
आराइश की बंदिशों के पार ,
आज वो पहुँच चुके हैं ।
हम अपनी नज़ाकत उस छितिज से पहले ही खो चुके हैं ।
इन दूरियों का नज़दीकियों से सौदा कर ,
उस अक्स के नजदीक जा कर,
इस भरी अंजुमन मे खुद को तन्हा पाते हैं ,
पता नही क्यूँ ऐसे अक्स हमसे जुदा हो जाते हैं ?
बस छोड़ जाते हैं वो रंगीन पल,
जिन्हे देखा था हमने कल । 
वो चाँद सा चेहरा ,
जिन पर था तारों का पहरा । 
वो मासूम सी आंखे ,
जो सीधे दिल मे झाँके । 
ओठ तेरे पंखुड़ी रूपी ,
मानो गुलाब ने थी उन्हे कोमलता सौंपी ।
तेरी जुल्फों का यूं ही हवा का साथ पा कर उड़ना ,
फिर उनका तेरे चेहरे से बिछुड़ना ,
फिर तेरी नजरों का मेरी नजरों से मिलना ,
और फिर वो हौले से शरमाना ,
ये सब मुझे मजबूर कर गए ,
इन दूरियों का नज़दीकियों से सौदा करने को ,
उन कही बातों को फिर से कहने को ,
उस आराइश के दरमियाँ होने को ,
या यूं कहूँ इस जिंदगी को फिर से जीने को । 
पर ये जिंदगी फिर से जीने की बाँट जोहती रही ,
अब ये परी मेरे सपनों मे न रही ,
गायब हो गयी अचानक किसी अक्स की तरह ,
उन बारिश की बूदों की तरह ,
जो कुछ पल की मोहताज होती हैं ,
वैसे भी हर परछाई अपनी कहाँ होती है ? 
वैसे भी हर परछाई अपनी कहाँ होती है ?…

Vishal Maurya

Zakir Hussain Delhi College, DU

vishal18995@gmail.com


सीने में कहीं एक दर्द सिसकती है अब…
रो- रो कर आँसू भी कम पड़ गयें हैं अब…
गमों की डोर से आँखें धूँधली पड़ गई हैं अब…
माँ तुम्हारी याद बहुत आती है अब…

सहमा और डरा सा रहता हूँ मैं अब…
खुद ही खुद में खोया सा रहता हूँ मैं अब…
रुक – रुक कर राहों पर चलता हूँ मैं अब…
माँ तुम्हारी याद बहुत आती है अब…

कहने को सब कुछ है मिला,पर फिर भी कुछ कमी है अब…
जब देखता हूँ पास,तब तुम नहीं दिखती अब…
जीने को फिर भी जी रहा हूँ,मर-मर के अब…
माँ तुम्हारी याद बहुत आती है अब…

जीतने की चाहत है,जीतना चाहता हूँ अब…
पर जीतने के लिये पास नहीं हो तुम अब…
और अंत में खुद को हारा सा महसूस करता हूँ अब…
माँ तुम्हारी याद बहुत आती है अब…

तुम्हारी याद में,आँखे भर आती हैं अब…
कोई भी पास नहीं,सिर रख के रोने के लिये अब…
काश ! पास तुम होती तुम और गोद में छुपा लेती अब…
माँ तुम्हारी याद बहुत आती है अब…

काश ! बचपन की तरह गोद में सो पाता अब,
काश ! रोने पर तुमको गले से लगा पाता अब,
काश ! हर- कदम पर तुम्हरा साथ दे पाता अब…
माँ तुम्हारी याद बहुत आती है अब…

काश ! जीवन में जितने भूल करता,सुधार देती झट-पट तुम अब…
काश ! पल ही पल में हँसता खेलता बचपन ला पाता अब…
काश ! दुनिया के इस चक्रव्युह से खुद को बचा पाता अब…
माँ तुम्हारी याद बहुत आती है अब…

Indranil Shukla

KIIT  University


नया सफर, नई मंज़िलें…
एक सफर शुरु नई मंजिलें तलाशने,
एक सफर शुरु नई ख्वाहिशों को जानने…
कि है नजर इस राह की अंगड़ाईयों पर, 
हां है निगाह इन अनछुई परछाईयों पर…
ये दरख्त जो सवाली ठहरे हैं, 
इस राह में न जाने कितने पहरे हैं…
खो न जाए उलझनों में शख्सियत तेरी,
कतरा रोशनी का कम अंधेरे गहरे हैं…
यूं चुपके से हवा दे रही ये मशवरा,
इस सफर में चलना मगर आहिस्ता ज़रा…
कि टूटने की उम्मीद ज्यादा है,
खैर तू बता, तेरा क्या इरादा है…
इस राज़ को समझना ज़रा मुश्किल है,
तेरा टूटके बिखरना भी मुमकिन है…
आज़माईश को तेरी ज़र्रा-ज़र्रा आमादा है,
क्योंकि ज़िन्दगी का फलसफा थोड़े से कुछ ज्यादा है…
बस वफा के ऐवज वफा की उम्मीद न करना,
ज़िन्दगी की दौड़ में बेग़ैरत न बनना…
संभलना सीख ही लेंगे लड़खड़ाते ये कदम,
ऐ मुसाफिर तू बीते वक्त की गुज़री तारीख़ न बनना…

Kundan Bhoot

kundanbhoot007@gmail.com


पहले दिन जब हम ट्रेनिंग के लिए दूरदर्शन भवन पहुचे तो सरकारी कार्यालय के सोते हुए सिस्टम ने हमारा स्वागत किया और पूरा एक घंटा सेमिनार हॉल में व्यर्थ बैठने के बाद हमे ज्ञात हुआ कि हमारी सारी उत्साहिकता पे बड़े ही प्यार से पानी नहीं चाय फेर दिया गया था | इतने लम्बे इंतज़ार के बाद कहीं जाकर एक महोदय आये और उन्होंने आधे घंटे का लेक्चर दिया जिसका एक अक्षर भी हमारे पल्ले न प ड़ा क्यूँकि उन्हें ये भी नहीं पता था की सामने बैठा बैच कौन सा है |खैर लंच ब्रेक हुआ तो हमने कैंटीन की तरफ रुख किया | बाहर से एक मामूली सी कैंटीन दिखने वाला उस भवन का वो कोना बाद में हमारा ट्रेनिंग पे आने का soul reason बन जायेगा ये तो हमे पता ही नहीं था, भीतर जाकर जब हमारी नज़र रेट लिस्ट पे पड़ी तो हमारी आँखें खुली की खुली रह गयी, मात्र दस रुपये में लजीज आलू के परांठे, सात रुपये में CCD की कॉफ़ी, २�¥ ¦ रुपये में मसाला डोसा इत्यादि | एक बार फिर हम हर्षोल्लास से भर गए | कम पैसों में भर पेट खाना खा कर इतनी ख़ुशी हुई तो हमे लगा ज़रा अपने दोस्तों को भी इस बात से अवगत किया जाए. धडाधड़ whatsapp का प्रयोग किया गया. रेट लिस्ट की फोटो भेज कर हम ऐसे प्रसंचित्त थे जैसे हमारी वहां नौकरी लग गयी हो. फिर तो हर निर्धारित दिन पर कार्यालय जाकर पहले जितना ज्ञान समेट पाते समेटते और फिर पहुच जाते थे कैंटीन| एक दिन हमे पता चला कि भवन के दूसरे तल पर भी एक mini canteen है.हम ऐसे कैसे किसी भी खजाने को हाथ जाने देते तो अगले ही दिन हम वहां भी पहुच गए | पता चला की यहाँ तो ज्यादा अच्छी कॉफ़ी मिलती है, फिर हमारा अड्डा ज़रा शिफ्ट हो गया | उस मिनी कैंटीन में काम करने वाले भैया काफी मिलनसार हैं| एक रोज़ यूँ ही वो हमे कुछ रेगुलर कस्टमर के बारे में बताने लगे, हम भी बातूनी कम कहाँ हैं हमने उनकी बातों में रूचि ली तो वो �¤ �र खुल कर बातें करने लगे और बातों बातों में हमने पूछा कि आप यहाँ कब से काम कर रहे हो ? 
” पांच साल हो गए हैं .जब मैंने यहाँ काम शुरू किया था तो आधे से ज्यादा कमरे और फ्लोर खाली थे तब DD NEWS नहीं था इनके पास. फिर धीरे धीरे सरकार ने और पैसा लगाया और लोग बढ़ते गए. हर फ्लोर के हर कमरे में रूम डिलीवरी करता हूँ. यहाँ कोई ऐसा नहीं होगा जो मुझे ना जानता हो | दिन भर में हर कमरे में चक्कर लग जाते हैं| अब तो इन के साथ काम करके इनके जैसा ही हो गया हूँ| जब नया नया आया था तो बहुत परेशान हुआ था, लग�¤ �ा था इनके पास पर power है इसलिए डरता था पर अब पता चल गया है कोई power नहीं है इनके पास| अब अपनी मर्ज़ी से काम करता हूँ| एक साहब ने आधे घंटे पहले कॉफ़ी मंगायी थी अब तक नहीं ले गया, बैठे होंगे वो इंतज़ार में.”
ये बोल कर वो बड़ी ही बेबाकी से हँस दिया |
हम हैरान थे हमने कहा आप जाकर उन्हें कॉफ़ी दे आइये वरना…
हम अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि वो बोल उठा ” वो मेरे काम में गोली देते हैं तो मैं उनके काम में गोली दूंगा. इनके हाथ में कुछ नहीं है, एक स्विच तो लगवा नहीं सकते ये | कितना बोला मैंने कि coffeemaker के लिए एक नया स्विच बोर्ड चाहिए पर सब को सिर्फ दुसरे पे काम टालना आता है. हर बड़े अफसर के अचानक से हाथ बंध जाते हैं और खुद को सबसे powerful कहने वाले अफसर को अचानक से ऊपर बैठे आला अफसरों की याद आ जाती है. मुझे कोई डर नहीं है इनका.”
जिस तरह वो उन सारे बड़े अफसरों को “इनके” कह कर एक पल खुद से छोटा सिद्ध कर दे रहा था वो हमारे लिए आश्चर्यजनक था. कुछ देर पहले जो आदमी हमे रोज़ आने जाने वाले बच्चो के मजेदार किस्से सुना रहा था वो अब हमे अपनी आखों से देश का सिस्टम दिखा रहा था. 
एक बार जो उसने बोलना शुरू किया तो लगा जैसे सालों से एकत्रित किया सारा गुबार वो आज निकल कर ही मानेगा | फिर तो उसने कई ऐसे कच्चे चिट्ठे खोले | उसने हमे बताया कि कुछ साल पहले vacancy के नाम पे दो पोस्ट निकाले गए थे जिसके लिए डेढ़ लाख से भी ज्यादा फॉर्म आये थे पर उन बेचारे डेढ़ लाख भारतियों को कहाँ पता था कि उनके फॉर्म महज समोसे खाने के काम आये थे क्यूँकि जो दो vacancy निकली थी उनके वारिस तो पहले ही र ोजाना उसी भवन में पार्टी कर रहे थे |
“मैंने तो फॉर्म भरने के बारे में सोचा भी नहीं क्यूँकि मुझे पता था कि कंप्यूटर पे जिस तेज़ी से “number of applications ” बढ़ रही हैं उतने ही ज्यादा इन अफसरों की शाम कि पार्टी का इंतज़ाम हो रहा है. मैं ही तो कॉफ़ी, चाय , सूप बना कर ले जाता था | मैं यहीं सही हूँ कम से कम सबको इमानदार coffee पिला कर ख़ुशी तो मिलती है ! इनके बीच इनके जैसा काम मुझसे ना हो पायेगा| “
इन सब हकीकतों से हम वाकिफ तो पहले भी थे पर इस तरह से कभी किसी को बोलते हुए नहीं देखा था | एक आम कॉफ़ी बनाने वाला हमे हमारे ही हाल से रूबरू करा रहा था. हमे कुछ बोलने कि ना तो ज़रुरत पड़ रही थी न ही वो हमे मौका दे रहा था. 
” फॉर्म तो मैंने भरा भी नहीं , भर भी देता तो कुछ ना होना था और वैसे भी हाई स्कूल फेल इंसान को कौन नौकरी देगा | पढाई तो मैंने तब छोड़ दी थी जब मेरे TC पे उन्होंने लिख दिया था ‘फीस न जमा करने के कारण नाम काटा गया ‘| “
वो कुछ देर के लिए शांत हो गया |
हमे लगा शायद उसे इस बात का पछतावा है या शायद गम है कि गरीबी के कारण फीस न जमा कर पाया और पढाई अधूरी रह गयी|हम अपने मन में कुछ राय बना ही रहे थे कि वो दुबारा बोल पड़ा..
” अरेफीस ना पूरी दी होती तो क्या बोर्ड से मेरा परीक्षा पत्र आ जाता | वो तो तभी मिलता है जब कोई फीस बकाया ना हो. मैंने कहा उनसे कि मेरी फीस पूरी जमा है पर किसी ने मेरी एक ना सुनी. प्रधानाचार्य तक के पास गया कि सर ऐसा क्यूँ कर रहे हो पर उनके पास भी कोई जवाब नहीं था.” 
उसकी आवाज में झल्लाहट साफ़ झलक रही थी, गुस्सा था पर पछतावा नहीं | 
” नवी क्लास में इतना होशियार था मैं पढने में very good था, हिंदी इतनी अच्छी थी कि सब तारीफ करते थे पर पता नहीं किस बात का बदला ले रहे थे| बस तभी मैंने पढाई छोड़ दी. कसम खा ली कि अब कभी नहीं पढूंगा”
हमसे रहा न गया और हमने बोला ” पर भैया इससे नुक्सान तो आपका ही हुआ न जिसने ऐसा किया उससे तो कोई फर्क भी नहीं पड़ा. पढाई कितनी ज़रूरी है…”
और एक बार फिर उसने हमारी बात काट दी ” उस TC को लेकर मैं जिस भी जगह जाता सबको यह लगता या तो ये कोई गुंडा बदमाश है जिसे स्कूल से निकाल दिया गया या फिर इतना गरीब है कि फीस नहीं दे पाया तो कॉलेज की फीस क्या भरेगा” विद्या का महत्व पता है मुझे पर विद्या केजब मुझे धोखा दे दिया तो अब मुझे दुबारा कोशिश नहीं करनी यहीं ठीक हूँ मैं. यही हाल है UP का | आज भी वो कागज का टुकड़ा है मेरे पास जिसपे लिखा है ‘ फीस न जमा करने की वजह से नाम काटा गया ‘ , खून खौल उठता है उसे देख कर “
उसकी आवाज में दर्द था, आँखों में गुस्सा पर होंठों पे एक बेबाक सी मुस्कान | 
हम अब हर तरह से निरुत्तर हो चुके थे | गुनेहगार कौन था ये तो ना उसे पता था ना हमे, कोई “वो” था जिसने एक आम आदमी के भविष्य के साथ घिनोना मज़ाक किया था | उसने कोई जवाब नहीं माँगा था पर हम सवालों से घिर गए थे, उसकी बातों ने हमारे मन में इतने प्रश्न चिन्ह बना दिए थे कि हमसे कुछ बोला ही नहीं जा रहा था | तभी वहां कुछ कस्टमर्स आ गए और वो आदमी जिसने अभी अभी हमे अन्दर तक झकझोर दिया था, अपनी कुर्सी से उठा और आर्डर के अनुसार लेमन टी बनाने लगा. वही पुराने से स्विच बोर्ड का बटन ऑन करके वो अपनी ज़िन्दगी में वापस चला गया और हम बस “कल फिर आएंगे” कह कर वहां से चले गए.

~~ हमने ज़िन्दगी से न कीमती खजाने मांगे थे
ना बेवजह खुशियों के बहाने मांगे थे
रात हो तो चैन की नींद आ जाये जहाँ 
ले दे कर कुछ ऐसे ठिकाने मांगे थे ~~

Arzoo Jaiswal

KIET Ghaziabad


मुझे अब लौट जाना हैं,

अचानक टूट जाना हैं,

के मेरे देश से आगे कोई परदेश मेरी मंज़िल हैं,

और मेरे दोस्तों ने हाथ मे सफ़र का दाग भी बढ़ा दिया हैं ॥

 

वो रिश्ता करके कल की बातें भुलाएं जा रही,

जो रिश्ता सम्भालतें  हुऐ जा रहा,

पर वो बातें, जो तेरे हंसीन सा चहरे पें नुमाया थीं,

वो सारे लब्ज़, यू ईस्क के आँखों पर उतरे ॥

 

तेरे खामोश ज़ुबा में छुपें गुमराह के अफ़साने,

तेरे गुफ़्तहार कि रिमझिम, तेरे रफ़तार के मौसम,

तेरे ईकरार कि वो नज़ाकत,

तेरे दिल से ऊबलते खून के पाक नग्मे,

तेरे चहरे के खामों-खद में छुपें आँह ॥

 

तेरे एहसास कि सिद्द्त,

तेरे जज़्बात कि हिम्मत,

में सब कुछ याद रखूँगा,

तेरी खामोश आवाज़े,मेरी जीवन में याद बनके ऊभरेंगी ,

 मुझे अब लौट जाने दे,

अचानक टूट जाने दे ॥

दीप शंकर घोष

KIIT School of Biotechnology

deepsnkr.ghosh@gmail.com


मेरी दिल की पुकार,

तुम सुन ना पाए ,

मेरे इस पागल दिल को,

तुम अपना ना बना पाए॥

कह दिए बड़ी आसानी से,

की भूल जाओ हमे,

लेकिन साँसो की पुकार को,

तुम समझ ना पाए ॥

चल दिए किसी और का हाथ थाम कर,

रह गए हम अकेले, इन तन्हा राहों पर ।

भूल जाने की कोशिश करते रहे,

अपना मन मार कर ॥

लेकिन ये दिल आज भी,

याद करता है तुम्हे थक-हारकर,

मेरे दिल की आवाज,तुम सुन ना पाए,

हम रह गए तन्हा,अकेले इन राहों पर ॥

माना गलतियाँ हुई थी मुझसे,

पर उनको सुधारा भी था मैनै,

इन सब के बावजूद,तुमने ठुकराया क्यूँ मुझे ?

आखिर सजा कुछ यूँ मिली है अब हमें,

अकेले जीने की सजा मिली है अब हमें ॥

Indranil Shukla

KIIT University, Odisha

School of Biotechnology

suklaindranil@gmail.com

https://www.facebook.com/suklaindranil


इश्क-आशिकी

जीवन सुधा है तू ,
ए मृगनयनी
मेरे जीने की वजह है तू !!

तेरे कस्तूरी ने हमे तुझ तक खिंचा है ,
पलकों ने तेरे , हमे बांधे रखा है ,
हमारे इस दिल को ,
तेरे उस प्यार भरे झलक ने सींचा है !!

जिंदगी है ये छोटी सी ,
पल में खत्म हो जाएगी ,
ए दिलरुबा , चाह लिया अगर तुने ,
कसम खुदा की ,
ये जिंदगी अमर हो जाएगी !!
जीवन सुधा है तू …………………………….!

बादल का रुख भी अजीब है ,
बरसता हर जगह है ,
भिगोता हर किसी को है ,
पर न जाने क्यूँ, हमसे इतना खफा है !
जीवन सुधा है तू …………………………………….!

इश्क की इस आंधी में ,
सूखे पत्ते की तरह है ,
हवा के झोके ने ,
जिसे इस तरह झकझोरा है ,
जो हर किसी ने दुत्कारा है ,
मोहब्बत के समंदर में ,
अपनी आशिकी ने ही नक्कारा है !
जीवन सुधा है तू………………………………..!

Ranesh Anand

National University of Study and Research in Law, Ranchi

rairanesh3@gmail.com

http://cloudymindranesh.blogspot.com/


क्यों हो गये है हम इतने स्वार्थी ? क्यों नहीं दिखते हमें दूसरे प्राणी ? पानी जिसपे सबका बराबर हक है, क्यों छीन रहे है हम दूसरे प्राणी का पानी!

पानी में हैं बहुत शक्ति,वो देता हमें जीने की शक्ति, क्यों छीन रहे हैं हम दूसरे प्राणी की शक्ति

क्या हम में हैं इतनी सी भक्ति |

छीन के उनका पानी उसको भी कर रहे है प्रदूषित

ना खुद जी रहे है,ना जीने दे रहे है दूसरे प्राणी को,

क्यों हो गये है इतने स्वार्थी ?

पानी जीने का सार है, छीन के उसका पानी छीन रहे है उसका जीवन सारा,

कर रहे है इतना बड़ा पाप, छीन के किसी का जीवन, क्या जी पाएँगे हम ?

क्या बस इतनी सी रह गयी है इंसानियत,

कमज़ोरो से छीन रहे उनका हक |

क्या खुद के स्वार्थ के लिए,छीन लेंगे हम

दूसरों का जीवन, क्या नहीं है उनको जीने का हक,

क्या है ये उनकी ग़लती या है ये उनका गुनाह,

जो बाँट रही ये दुनिया हम इंसानों के साथ 

क्या हमारे समाज ने यही सिखाया,

कमज़ोरों का उठाओ ग़लत फ़ायदा |

selected (11)

क्या जो प्राणी बोलता नहीं,

नही सुननी चाहिए हमे उसकी मन की कहानी,

लगता है हमे हमारा जीवन कितना अहम,

क्या नहीं है उनका जीवन अहम,

पानी जीने का सार है देता वो सबको जीवन,

क्यों छीन के उनका पानी, छीन रहे है उनका जीवन |

क्यों हो गये है हम इतने बूरे,

क्या मिट गयी हम में इंसानियत

क्यों हमरे लिए सिर्फ़ हम ही रह गये |

छीन के दूसरो के जीने का हक,

क्या जी पाएँगे हम??

logoदिव्या लूनावत

https://www.facebook.com/divya.lunawat.5

Creative Writing event @ Panache 2013 by CampusWriting…